सीहोर। एक तरफ सरकार सबका साथ-सबका विकास और दलित-आदिवासी उत्थान के बड़े-बड़े दावे करती है, वहीं दूसरी तरफ जिले में अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग के पीडि़त सरकारी सिस्टम की फाइलों में दबकर रह गए हैं। दबंगों की प्रताडऩा झेलने के बाद अब इन पीडि़तों को अपनी हक की राहत राशि के लिए आदिम जाति कल्याण विभाग के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। जिले में आलम यह है कि 173 स्वीकृत प्रकरणों में महीनों बीत जाने के बाद भी फूटी कौड़ी नसीब नहीं हुई है।
नियमों के मुताबिक एससी-एसटी एक्ट के तहत दर्ज मामलों में पीडि़तों को तीन चरणों में आर्थिक सहायता दी जाती है। पहली किश्त एफआईआर दर्ज होते ही मिलनी चाहिए, ताकि पीडि़त को तुरंत सहारा मिल सके। दूसरी किश्त चालान पेश होने पर और तीसरी किश्त कोर्ट के फैसले के बाद दी जाती है। लेकिन सीहोर में सिस्टम इतना सुस्त है कि 10-10 महीने पुराने मामलों में पीड़ितों को पहली किश्त तक नहीं मिली है।
गरीबी और मजबूरी का दोहरा वार
इस लेतलाली का सबसे बुरा असर उन गरीब ग्रामीणों और महिलाओं पर पड़ रहा है जो आर्थिक रूप से बेहद कमजोर हैं। कई पीडि़त दूर-दराज के गांवों से किराया खर्च कर विभाग के दफ्तर आते हैं, लेकिन उन्हें हर बार खाली हाथ और सिर्फ आश्वासन लेकर लौटना पड़ता है। जातीय हिंसा और अपमान झेलने वाले इन परिवारों के लिए यह सरकारी देरी किसी दूसरे ‘अत्याचार’ से कम नहीं है।
2 करोड़ की मांग, पर कब आएगा फंड
विभाग के पास बजट न होना भी एक बड़ी बाधा बना हुआ है। आदिम जाति विभाग के संयोजक एके कुशवाह का कहना है कि राशि की मांग की गई है।


